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एक सवाल

मेरे भीतर कुछ हो रहा है।
एक आवाज़ है जो गूंज रही है।
कब? कब? कब? कब?
एक सवाल है जो गूंज रहा है।
कब? कब? कब? कब?
टकरा रहा है अंदरूनी दीवारों से,
तोड़ रहा है।
एक चक्रवात सा है सीने में,
घूम रहा है।
कब? कब? कब? कब?
सहलाब सा उठता हुआ हर कोने तक पहुँच रहा है,
फटता हुआ लावा सा गहराइयों को चीर रहा है,
तूफान बड़ा कोई जो तबाही के पथ पर हो,
भूकंप बना वो मेरी नीव झकझोर रहा है,
एक सवाल है, जो गूंज रहा है।
कब? कब? कब? कब?

धड़कन तेज़ हो गयी है,
मुख लाल हो गया है,
आँखे बड़ी हैं, गुस्सा है।
मगर किसपे? मगर क्यों?
सबपे है, खुदपे है, बस है।
कब? कब? कब? कब?
कब?
कब जीना शुरू करोगे?